नई दिल्ली। ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन’ के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में दो अलग-अलग घटनाओं में एक ही दिन तीन लोगों की मौत के साथ, इस साल 188 दिनों में देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंक में मरने वालों की संख्या 101 हो गई है। अकेले दिल्ली के एनसीआर में 12 मौतें हुई हैं। यह संख्या इसलिए भी चिंताजनक है कि 2025 में पूरे साल में 121 मौतें दर्ज की गई थीं।
एसकेए के संयोजक बेजवाड़ा विल्सन के यहाँ जारी बयान के अनुसार देश में हर 45 घंटे में सीवर में एक मौत होने के बावजूद, बेशर्म सरकारें आपराधिक चुप्पी साधे हुए हैं। कहने की ज़रूरत नहीं है कि सरकार के लिए दलितों की जान की कोई अहमियत नहीं है और इसे एक आम बात मान लिया गया है। यह चलन कितना व्यापक है, इसे इस आसान सी बात से समझा जा सकता है कि इस साल 16 राज्यों से सीवर और सेप्टिक टैंक में मौतों की खबरें आई हैं।
पिछले दशक में सीवर और सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है। 2016 में सिर्फ़ 39 मौतें दर्ज की गई थीं, जो अगले साल 2017 में 350% बढ़कर 137 हो गईं।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और उसके बाद ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स (हाथ से मैला ढोने वाले) के तौर पर रोज़गार पर रोक और उनके पुनर्वास अधिनियम’, 2013 के लागू होने के बाद, उम्मीद थी कि सरकारें सक्रिय कदम उठाएंगी। लेकिन एसकेए ने नए कानून के लागू होने के बाद से 1726 मौतें दर्ज की हैं। इनमें से 1203 मौतें सिर्फ़ सात राज्यों से हुईं – तमिलनाडु (332), गुजरात (216), दिल्ली-NCR (157), महाराष्ट्र (155), उत्तर प्रदेश (148), हरियाणा (104) और बिहार (91)।
इतनी बड़ी संख्या के बावजूद, इनमें से किसी भी राज्य ने इन मौतों को रोकने के लिए एक भी कदम नहीं उठाया है।
जुलाई 2023 में मोदी सरकार ने नमस्ते (मैकेनाइज़्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना) स्कीम शुरू की थी। इस स्कीम में शौचालय बनाने के लिए 349.73 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। स्वच्छ भारत योजना के तहत, सरकार ने 12 करोड़ शौचालय बनाने पर पहले ही 19 हज़ार करोड़ रुपये खर्च कर दिए थे। लेकिन न तो साफ़-सफ़ाई के सिस्टम को मशीनीकृत किया गया और न ही सूखे शौचालयों को पूरी तरह खत्म किया गया।
विडंबना और दुर्भाग्य की बात है कि इतने सालों तक मोदी सरकार के मंत्री संसद में इस बात से इनकार करते रहे कि देश में मैला ढोने (मैनुअल स्कैवेंजिंग) की वजह से कोई मौत हुई है। इससे यह भी पता चलता है कि सरकार सफ़ाई कर्मचारियों की ज़िंदगी को कितनी अहमियत देती है, जिन्हें आज भी अछूत माना जाता है।
एसकेए ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि वे सीवर और सेप्टिक टैंक के अंदर होने वाली मौतों को तुरंत पूरी तरह से रोकने का ऐलान करें।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)